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  • खेतों में क्रांति: कैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बदल रहा है भारत की खेती का चेहरा

    खेतों में क्रांति: कैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बदल रहा है भारत की खेती का चेहरा

    Indian farmer using smartphone in a field with drone and AI-based farming tools.

    भारत में खेती करना कभी आसान नहीं रहा। कभी बिन मौसम बारिश, कभी सूखा, ऊपर से महंगे बीज, खाद और फसल के कम दाम — किसानों की मुश्किलें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं। लेकिन अब इन चुनौतियों के बीच एक नई उम्मीद दिख रही है — टेक्नोलॉजी के रूप में। और इसमें सबसे आगे है AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। अब ये कोई फिल्मी चीज़ नहीं रही, बल्कि असली खेतों में काम कर रही है — वो भी इंडिया के अलग-अलग हिस्सों में।

    इस ब्लॉग में हम यही समझेंगे कि AI खेती में असल में करता क्या है, ये कहां और कैसे इस्तेमाल हो रहा है, किसानों को क्या फायदा मिल रहा है, और कहां-कहां दिक्कतें बाकी हैं। साथ ही बात करेंगे कि कैसे छोटे किसान, जो दूर-दराज गांवों में रहते हैं, वो भी इस बदलाव का हिस्सा बन सकते हैं।

    AI खेती में मतलब क्या है?

    सिंपल भाषा में कहें तो AI यानी ऐसा सिस्टम जो मशीन को सोचने, सीखने और फैसले लेने लायक बना देता है। जब इसे खेती में लगाया जाता है, तो इसका मतलब है – ऐसे ऐप्स, सेंसर्स, ड्रोन और सैटेलाइट डेटा का इस्तेमाल जो किसान को बता सकें कि अगला कदम क्या होना चाहिए।

    उदाहरण के लिए – मिट्टी सूखी है या नहीं, कितनी सिंचाई करनी है, कीड़े लगने वाले हैं या फसल बीमार हो रही है – ये सब अलर्ट फोन पर मिल सकता है। पंजाब का कोई किसान अगर गेहूं उगा रहा है, तो उसे फोन पर मैसेज आ सकता है – “मिट्टी सूखी है, आज पानी दे दीजिए।” या महाराष्ट्र का कोई कपास किसान अपने मोबाइल से पता कर सकता है कि कीटों की एक्टिविटी बढ़ रही है, और अब दवाई का सही समय है।

    AI का इस्तेमाल भारत के खेतों में कैसे हो रहा है?

    सोचिए मत कि ये सब सिर्फ बड़े शहरों या अमीर किसानों के लिए है। आज ओडिशा, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में भी किसान AI बेस्ड टूल्स आजमा रहे हैं।

    सरकार की ‘Per Drop More Crop’ स्कीम को ही ले लीजिए। इसमें AI की मदद से पानी की बचत कर बेहतर फसल उगाने की कोशिश की जा रही है। ये सिस्टम मिट्टी की नमी, मौसम और फसल की जरूरतों को देखकर तय करता है कि कितना पानी कब देना चाहिए

    फिर है National Pest Surveillance System। नाम भले ही भारी लगे, लेकिन काम बिल्कुल सीधा है – किसानों को पहले से बता देना कि कीट या टिड्डी जैसी समस्याएं आने वाली हैं। समय रहते जानकारी मिले तो पूरी फसल बचाई जा सकती है।

    कुछ भारतीय स्टार्टअप भी इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। जैसे CropIn, जो किसानों को फसल की सेहत के बारे में अपडेट देता है। वहीं Intello Labs तो एक फोटो खींचने से ही बता देता है कि पत्ते में कोई बीमारी है या नहीं — और वो भी इतनी तेजी से कि इंसान भी इतनी जल्दी नहीं पहचान पाता।

    असल मकसद सिर्फ मशीन देना नहीं है, बल्कि उस छोटे किसान तक जानकारी पहुंचाना है, जिसे अब तक सिर्फ बड़े किसानों के पास एक्सेस होता था।

    ज़मीन पर क्या बदला है?

    किसी से मत छुपा है कि खेती हमेशा अनिश्चितताओं से भरी रही है। लेकिन अब AI धीरे-धीरे उन अनजान जोखिमों को कम कर रहा है।

    सबसे बड़ा फायदा है खर्च में कटौती। जब खाद और दवाई सिर्फ जरूरत के मुताबिक दी जाती है, तो खर्च 30% तक घट सकता है। इससे मिट्टी भी ज्यादा केमिकल से बचती है, पानी साफ रहता है और किसान की जेब भी कुछ हल्की नहीं होती।

    AI की मदद से अब बाजार की मांग भी पहले से पता चल जाती है। यानि अगर पश्चिम बंगाल का किसान हर साल धान बोता है, लेकिन इस बार ऐप बता रहा है कि मसूर में ज्यादा फायदा है, तो वह फसल बदल सकता है। यही है स्मार्ट खेती

    जानकारी बांटना भी अब आसान हो गया है। पहले सूखा झेलने वाले बीजों या ऑर्गेनिक खेती की जानकारी सीमित लोगों तक थी। अब मोबाइल ऐप्स पर स्थानीय भाषा में जानकारी मिल रही है। तमिलनाडु का किसान जैविक खाद के बारे में पढ़ रहा है, तो यूपी का किसान टमाटर की बेहतर खेती सीख रहा है – वो भी AI से।

    अभी भी कुछ दिक्कतें बाकी हैं

    हर अच्छी चीज़ के साथ कुछ चुनौतियां भी आती हैं। और AI खेती में भी यही हो रहा है।

    सबसे पहले तो ये टेक्नोलॉजी महंगी हैहर किसान के पास स्मार्टफोन नहीं है, सेंसर्स या ड्रोन खरीदना तो दूर की बात। कई गांवों में इंटरनेट की स्पीड इतनी खराब है कि ऐप ही नहीं चलता।

    ऊपर से ये टूल्स ज़्यादातर प्राइवेट कंपनियों के बनाए हुए हैं। अगर सरकार सपोर्ट न दे, तो छोटे किसान इससे दूर ही रह जाएंगे। हरियाणा के बड़े फार्म में भले ही रोबोट चल रहे हों, लेकिन झारखंड के आदिवासी गांव में लोगों ने शायद उसका नाम भी न सुना हो।

    अब आगे क्या करना होगा?

    अगर AI को खेती का असली साथी बनाना है, तो इसे हर किसान की ज़िंदगी का हिस्सा बनाना होगा – जैसे ट्रैक्टर या यूरिया।

    सरकारी सब्सिडी, ट्रेनिंग प्रोग्राम, और सबसे जरूरी लोकल भाषा में टूल्स बनाना जरूरी है। जो किसान पढ़ नहीं सकता, उसके लिए वॉयस-बेस्ड ऐप्स भी बनने चाहिए।

    आने वाले कुछ सालों में AI-चालित ट्रैक्टर, शुगरकेन हार्वेस्ट करने वाले रोबोट, और स्मार्ट खेतों की तस्वीर कोई सपना नहीं रहेगी। लेकिन इसके लिए छोटे किसान को मजबूत करना होगा, गांवों में इंटरनेट पहुंचाना होगा और टेक्नोलॉजी को सस्ता बनाना होगा।

    मेरी अपनी सोच

    मैंने खेती को बहुत करीब से देखा है — रिश्तेदार, दोस्त, पड़ोसी — सब खेत में दिन-रात मेहनत करते हैं। खेती सिर्फ काम नहीं, एक उम्मीद है — हर बीज में एक सपना होता है।

    AI उस उम्मीद में थोड़ा सहारा बन सकता है — लेकिन तभी, जब ये हर किसान तक पहुंचे, ना कि सिर्फ अमीरों तक। अगर सही से इस्तेमाल हुआ, तो दुख कम कर सकता है, मुनाफा बढ़ा सकता है। लेकिन इसे चमत्कार नहीं, साधन समझिए।

    🔗 जरूरी लिंक

    🌱 भारत सरकार – Per Drop More Crop योजना
    माइक्रो-इरिगेशन पर आधारित सरकारी स्कीम की पूरी जानकारी।

    📡 CropIn – ऑफिशियल वेबसाइट
    देखिए कैसे ये भारतीय एग्री-टेक स्टार्टअप किसानों को रियल टाइम में मदद दे रहा है।

    🌿 ग्रीन की तरफ बढ़ते कदम: क्यों ऑर्गेनिक खेती ही है कृषि का भविष्य

  • ऑर्गेनिक खेती: देसी तरीके से, प्राकृतिक अंदाज़ में

    ऑर्गेनिक खेती: देसी तरीके से, प्राकृतिक अंदाज़ में

    Rooted in Nature: The Rise of Organic Farming in India

    आजकल हर तरफ़ ऑर्गेनिक फार्मिंग की बातें हो रही हैं। आपने भी जरूर सुना होगा। असल में ये कोई नया जादू नहीं है, बल्कि हमारी पुरानी देसी खेती का ही थोड़ा सुधरा हुआ रूप है। जहां खेत में DAP या यूरिया नहीं, बल्कि गोबर, कम्पोस्ट और नीम जैसी चीज़ें डाली जाती हैं। मतलब, जैसे हमारे दादा-परदादा खेती करते थे बिना ज़मीन को थकाए, बिना पानी को ज़हर बनाए।

    अब लोग धीरे-धीरे समझ रहे हैं कि रासायनिक खेती से ज़मीन तो बेजान हो ही रही थी, साथ में हमारे खाने में भी धीरे-धीरे ज़हर घुल रहा था। ऐसे में ऑर्गेनिक खेती एक सुकून भरा, टिकाऊ और देसी रास्ता लग रहा है।

    ऑर्गेनिक खेती का असली मतलब क्या है?

    देखिए, ये कोई किताबों वाला नियम नहीं है। इसका असली मकसद है हर चीज़ को सेहतमंद बनाए रखना ज़मीन, पौधे, जानवर और आखिरकार हम इंसान। सोचिए, अगर मिट्टी उपजाऊ रहेगी, तो फसलें भी तंदरुस्त होंगी और खाने वाले भी बीमार नहीं पड़ेंगे।

    इसमें नेचर से सीखने की बात है। जैसे पक्षी कीट खा लेते हैं, बारिश ज़मीन को सिंच देती है तो फिर केमिकल डालने की ज़रूरत क्या? ऊपर से इसमें ईमानदारी भी है किसान से लेकर ग्राहक तक सबको बराबरी का हक़ मिलना चाहिए। और ज़मीन की केयर? अरे वही तो समझदारी है आज हम उसे नहीं बिगाड़ेंगे, तभी तो हमारे बच्चे भी कल उस पर खेती कर सकेंगे।

    भारत में कैसे करते हैं देसी स्टाइल की ऑर्गेनिक खेती?

    सच कहें तो हमारे गांवों में ये ऑर्गेनिक तरीका कोई नया कॉन्सेप्ट नहीं है। हम तो पहले से ही इसी तरीके से खेती कर रहे थे अब थोड़ा और समझदारी से कर रहे हैं।

    उदाहरण के लिए, हम खेत में गोबर की खाद मिलाते हैं, हरी खाद डालते हैं, और फसल चक्र बदलते रहते हैं ताकि मिट्टी थके नहीं। मेरे पड़ोसी तो कहते हैं कि उनका नीम का स्प्रे कीड़ों पर ऐसा असर करता है, जैसे जादू!

    फिर एक तरीका है “मिश्रित खेती” का मतलब एक ही खेत में अलग-अलग फसलें लगाना। जैसे सब्ज़ियों के साथ गेंदे का फूल कीड़े भी कन्फ्यूज़ हो जाते हैं और खेत भी सुंदर दिखता है। अगर एक फसल खराब हो जाए तो दूसरी बचा लेती है। खरपतवार हो या कीड़े कोई ज़हर नहीं डालते, या तो खुद निकाल देते हैं या मुर्गियों को छोड़ देते हैं चरने।

    और जो भी खाद या टॉनिक डालते हैं, वो सब घर की बनी चीज़ें होती हैं जैसे वर्मी कम्पोस्ट या पंचगव्य। महक थोड़ी झेलनी पड़ती है, पर पौधों को बड़ा मज़ा आता है।

    क्यों करें ये मेहनत? क्या फायदा है?

    ऑर्गेनिक खेती में फायदा ही फायदा है, बस थोड़ा धैर्य चाहिए। सबसे पहले तो प्रकृति को राहत मिलती है—नदी-नालों में केमिकल नहीं बहता, हवा साफ़ रहती है, और ज़मीन में जान बची रहती है। सूखे मौसम में भी पानी ज्यादा साफ और टिकाऊ रहता है।

    और खाने का स्वाद? अरे भाई, शहर में रहने वाला मेरा कजिन कहता है कि “ऑर्गेनिक टमाटर खाओ तो असली टमाटर जैसा टेस्ट आता है, वरना तो प्लास्टिक लगते हैं।”

    किसानों के लिए पैसे का भी फायदा है। हर सीजन केमिकल खरीदने की टेंशन नहीं, और ऑर्गेनिक सामान बेचो तो दाम भी अच्छा मिलता है कई बार डबल! हां, मेहनत थोड़ी ज्यादा है, पर लंबे समय में जेब भी भर सकती है।

    थोड़ी मुश्किलें भी हैं, लेकिन नामुमकिन नहीं

    सच बताएं तो ऑर्गेनिक की राह फूलों से भरी नहीं है। शुरुआत के 2-3 साल फसल कम होती है, तो डर भी लगता है। फिर बाज़ार में ऐसे खरीदार ढूंढना जो सही दाम दे, वो भी एक टेंशन। और जो ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन का चक्कर है—भाईसाहब, कागज़, फीस, नियम… छोटा किसान तो थक ही जाए।

    फिर भी कुछ लोग मिसाल बन रहे हैं

    लेकिन उम्मीद की किरणें भी हैं। जैसे सिक्किम 2016 में पूरा राज्य ऑर्गेनिक बन गया! आज सब उन्हें खेती के रॉकस्टार की तरह मानते हैं। फिर Navdanya जैसे ग्रुप्स भी हैं जो 16 राज्यों में किसानों को नेचुरल खेती सिखा रहे हैं, और पुराने देसी बीज बचा रहे हैं। मतलब अगर मन से किया जाए, तो ऑर्गेनिक खेती से कमाल हो सकता है।

    आखिर में बात सीधी है…

    ऑर्गेनिक खेती आज के ज़माने में वही पुरानी देसी समझ है, बस थोड़ी और जागरूकता के साथ। ये तरीका न सिर्फ़ हमारी ज़मीन को फिर से जिंदा कर सकता है, बल्कि आने वाले कल को भी सुरक्षित रख सकता है।

    काम थोड़ा ज्यादा है, मगर अब लोग समझ रहे हैं कि अगर आज संभलेंगे तो कल की पीढ़ियों को साफ़ हवा, पानी और खाना मिल सकता है।

    तो क्यों न एक छोटा कदम हम भी उठाएं? धीरे-धीरे ही सही, मगर अपने देसी अंदाज़ में।

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