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  • ग्रीन की तरफ बढ़ते कदम: क्यों ऑर्गेनिक खेती ही है कृषि का भविष्य

    ग्रीन की तरफ बढ़ते कदम: क्यों ऑर्गेनिक खेती ही है कृषि का भविष्य

    An Indian farmer standing proudly in a lush green organic farm at sunrise, with healthy crops, clear blue sky, and eco-friendly vibe.

    आज की खेती सिर्फ बीज बोने और फसल काटने का खेल नहीं रह गया है। अब बात इससे कहीं बड़ी हो चुकी है अब सवाल ये है कि हम ज़मीन को बिना खराब किए, पानी को बिना ज़हर बनाए और अपने शरीर को बिना नुकसान पहुंचाए, खाना कैसे उगाएं।

    अगर आप एक बार ठंडे दिमाग से सोचें, तो साफ़ दिखता है नदियां गंदी हो रही हैं, मिट्टी में जान खत्म हो रही है, और इन सबके बीच सिर्फ एक रास्ता बचता है ऑर्गेनिक खेती। इसमें अब कोई शक नहीं।

    तो चलिए, आराम से बात करते हैं इस बारे में।

    ऑर्गेनिक खेती आखिर है क्या?

    जब “ऑर्गेनिक” शब्द सुनते हैं, तो कई लोगों के दिमाग में फैंसी सुपरमार्केट की महंगी सब्ज़ियां और फल घूमने लगते हैं। लेकिन असलियत ये है कि ऑर्गेनिक खेती का मतलब है खेती वैसे करना जैसे हमारे दादा-दादी करते थे।

    ना कोई केमिकल खाद, ना जहरीले स्प्रे। सिर्फ गोबर की खाद, कम्पोस्ट, नीम की पत्तियों का पानी, फसल चक्र, और ऐसी चीज़ें जो मिट्टी को नुकसान पहुंचाए बिना उसे और भी ज़्यादा उपजाऊ बनाएं।

    ये खेती लालच से नहीं, धैर्य और प्यार से की जाती है।
    और जब हम धरती माँ का ख्याल रखते हैं, तो वो हमें दोगुना लौटाती है।

    क्यों किसान अब दोबारा लौट रहे हैं प्राकृतिक खेती की ओर?

    एक समय था जब केमिकल खेती ने खूब फायदा दिया अन्न भंडार भर गए, फसलें बंपर होने लगीं।
    लेकिन फिर साइड इफेक्ट्स दिखने लगे

    • ज़मीन थक गई, केमिकल्स से भरी पड़ी है
    • पानी ज़हरीला हो गया
    • सब्ज़ियों में अब वो स्वाद ही नहीं रहा
    • और सबसे बड़ा झटका किसान कर्ज में डूबते जा रहे हैं, हर साल महंगे बीज, खाद और दवाई खरीदने में

    अब लोग सोचने लगे हैं क्या ये सब वाकई सही था?

    इसलिए अब हवा बदल रही है। किसान ही नहीं, ग्राहक भी समझ रहे हैं ऑर्गेनिक ही टिकाऊ रास्ता है।

    क्यों जरूरी है ऑर्गेनिक खेती?

    1. सेहत सबसे पहले

    केमिकल से उगी हुई सब्ज़ियां दिखने में चाहे जितनी सुंदर हों, अंदर छुपा जहर किसे दिखाई देता है?
    ऑर्गेनिक खाने में केमिकल नहीं होते, इसलिए ये बच्चों और बुजुर्गों के लिए भी सुरक्षित है।

    असल पोषण वहीं मिलता है जहां खेती शुद्ध होती है। सिर्फ पेट नहीं, शरीर भी तंदरुस्त रहता है।

    2. मिट्टी ही असली धन है

    सोना-चांदी बाद में, असली दौलत तो मिट्टी है।
    केमिकल खेती मिट्टी को बंजर बनाती है।
    वहीं ऑर्गेनिक खेती हर साल उसकी ताकत बढ़ाती है केचुएं, जैविक सूक्ष्म जीव, सब ज़िंदा रहते हैं।

    ये बिल्कुल वैसे है जैसे FD में पैसा डालते हैं धीरे-धीरे बढ़ता है, लेकिन मजबूत होता है।

    3. जलवायु की रक्षा, खामोशी से

    जहां टीवी पर जलवायु परिवर्तन की बड़ी-बड़ी बहसें चलती हैं, वहीं एक ऑर्गेनिक किसान बिना शोर मचाए धरती का तापमान घटा रहा होता है।

    ऑर्गेनिक मिट्टी हवा से कार्बन खींचती है और अपने अंदर रखती है।
    मतलब कम प्रदूषण, साफ हवा और ज़्यादा हरियाली।

    4. पानी को ज़िंदा रखना

    हर बार जब खेत में केमिकल स्प्रे होता है, बारिश के साथ वो ज़हर नदियों और झीलों में पहुंच जाता है।
    यही कारण है कि जगह-जगह पानी पीने लायक नहीं रह गया।

    ऑर्गेनिक खेती का मतलब है साफ पानी, ज़िंदा तालाब, और शुद्ध भूजल।

    5. लंबे समय का फायदा, छोटे लालच से बेहतर

    ऑर्गेनिक खेती में शुरू के 2-3 साल थोड़े कठिन होते हैं।
    पैदावार कम लगती है, मेहनत ज़्यादा लगती है।
    लेकिन जैसे-जैसे ज़मीन सुधरती है, फसलें भी खुद-ब-खुद अच्छी होने लगती हैं।

    ऊपर से ऑर्गेनिक सामान शहरों में अच्छी कीमतों पर बिकता है।

    यानि अंत में फायदे में किसान ही रहते हैं सेहतमंद ज़मीन, अच्छा मुनाफा और चैन की नींद।

    हाँ, मुश्किलें भी हैं लेकिन हिम्मत वाले टिकते हैं

    ऑर्गेनिक खेती आसान नहीं।

    • घास जल्दी उगती है, हाथ से निकालनी पड़ती है
    • कीड़े ज़्यादा परेशान कर सकते हैं
    • सर्टिफिकेशन का झंझट
    • हर जगह सीधे ग्राहक नहीं मिलते

    लेकिन जो किसान ये शुरुआती मुश्किलें पार कर लेते हैं, उनके लिए आगे का रास्ता साफ और समृद्ध होता है।

    भारत के किसान नई क्रांति के नायक

    हमारे देश में ऑर्गेनिक खेती कोई नई चीज़ नहीं।
    ये तो हमारे खून में है।

    पुराने जमाने में हमारे किसान गाय के गोबर से, नीम से, प्राकृतिक चक्र से खेती करते थे।

    आज सिक्किम ने तो 100% ऑर्गेनिक होकर मिसाल कायम कर दी।
    महाराष्ट्र, पंजाब, केरल में हजारों युवा किसान फिर से प्राकृतिक खेती की ओर लौट रहे हैं।

    Startups, मोबाइल apps और सरकारी योजनाएं जैसे परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) और National Programme for Organic Production इसमें मदद कर रहे हैं।

    भारत फिर से अपनी असली जड़ों की तरफ लौट रहा है धीरे-धीरे, लेकिन मजबूती से।

    ग्राहक भी अब जागरूक हो रहे हैं

    अब लोग सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, सेहत के लिए खाना खरीदते हैं।
    उन्हें फर्क पता है कौन सा खाना ज़हरीला है, कौन सा शुद्ध।

    ऑर्गेनिक दूध, गेहूं, फल सब कुछ अब शहरों में उपलब्ध है।
    ऑनलाइन डिलीवरी ने तो इसे और भी आसान बना दिया है।

    अब ऑर्गेनिक खाना “लक्ज़री” नहीं, “लाइफस्टाइल” बन रहा है।

    भविष्य का रास्ता साफ है

    अगर हम आगे की तस्वीर देखें, तो साफ है
    आने वाले समय में खेती का वही तरीका बचेगा जो धरती को बचा सके।

    जो किसान आज से शुरुआत कर रहे हैं, वो कल के लीडर होंगे।
    जो ग्राहक अब से सेहतमंद खाना चुन रहे हैं, वो परिवारों को बचा रहे हैं।

    और भारत जो कभी प्राकृतिक खेती में सबसे आगे था वो फिर से दुनिया को रास्ता दिखा सकता है, बस हमें अपनी मिट्टी पर भरोसा रखना होगा।

    अंत में बस यही अब हरियाली ही रास्ता है

    सेहतमंद लोग, साफ पानी और ज़िंदा धरती चाहिए तो हमें ग्रीन की तरफ बढ़ना ही होगा।
    ऑर्गेनिक खेती अब “चॉइस” नहीं, ज़रूरत है।

    ये एक प्यार है बीज से, मिट्टी से, और आने वाली पीढ़ियों से।

    चाहे आप किसान हों, ग्राहक हों या बस एक सोच रखने वाले इंसान अब वक्त आ गया है साथ चलने का।

    चलो मिलकर भारत को फिर से हराभरा बनाएं सेहतमंद, मजबूत और आत्मनिर्भर।

    क्योंकि भविष्य सिर्फ उन्हीं का है, जो धरती का सम्मान करते हैं।

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  • ऑर्गेनिक खेती: देसी तरीके से, प्राकृतिक अंदाज़ में

    ऑर्गेनिक खेती: देसी तरीके से, प्राकृतिक अंदाज़ में

    Rooted in Nature: The Rise of Organic Farming in India

    आजकल हर तरफ़ ऑर्गेनिक फार्मिंग की बातें हो रही हैं। आपने भी जरूर सुना होगा। असल में ये कोई नया जादू नहीं है, बल्कि हमारी पुरानी देसी खेती का ही थोड़ा सुधरा हुआ रूप है। जहां खेत में DAP या यूरिया नहीं, बल्कि गोबर, कम्पोस्ट और नीम जैसी चीज़ें डाली जाती हैं। मतलब, जैसे हमारे दादा-परदादा खेती करते थे बिना ज़मीन को थकाए, बिना पानी को ज़हर बनाए।

    अब लोग धीरे-धीरे समझ रहे हैं कि रासायनिक खेती से ज़मीन तो बेजान हो ही रही थी, साथ में हमारे खाने में भी धीरे-धीरे ज़हर घुल रहा था। ऐसे में ऑर्गेनिक खेती एक सुकून भरा, टिकाऊ और देसी रास्ता लग रहा है।

    ऑर्गेनिक खेती का असली मतलब क्या है?

    देखिए, ये कोई किताबों वाला नियम नहीं है। इसका असली मकसद है हर चीज़ को सेहतमंद बनाए रखना ज़मीन, पौधे, जानवर और आखिरकार हम इंसान। सोचिए, अगर मिट्टी उपजाऊ रहेगी, तो फसलें भी तंदरुस्त होंगी और खाने वाले भी बीमार नहीं पड़ेंगे।

    इसमें नेचर से सीखने की बात है। जैसे पक्षी कीट खा लेते हैं, बारिश ज़मीन को सिंच देती है तो फिर केमिकल डालने की ज़रूरत क्या? ऊपर से इसमें ईमानदारी भी है किसान से लेकर ग्राहक तक सबको बराबरी का हक़ मिलना चाहिए। और ज़मीन की केयर? अरे वही तो समझदारी है आज हम उसे नहीं बिगाड़ेंगे, तभी तो हमारे बच्चे भी कल उस पर खेती कर सकेंगे।

    भारत में कैसे करते हैं देसी स्टाइल की ऑर्गेनिक खेती?

    सच कहें तो हमारे गांवों में ये ऑर्गेनिक तरीका कोई नया कॉन्सेप्ट नहीं है। हम तो पहले से ही इसी तरीके से खेती कर रहे थे अब थोड़ा और समझदारी से कर रहे हैं।

    उदाहरण के लिए, हम खेत में गोबर की खाद मिलाते हैं, हरी खाद डालते हैं, और फसल चक्र बदलते रहते हैं ताकि मिट्टी थके नहीं। मेरे पड़ोसी तो कहते हैं कि उनका नीम का स्प्रे कीड़ों पर ऐसा असर करता है, जैसे जादू!

    फिर एक तरीका है “मिश्रित खेती” का मतलब एक ही खेत में अलग-अलग फसलें लगाना। जैसे सब्ज़ियों के साथ गेंदे का फूल कीड़े भी कन्फ्यूज़ हो जाते हैं और खेत भी सुंदर दिखता है। अगर एक फसल खराब हो जाए तो दूसरी बचा लेती है। खरपतवार हो या कीड़े कोई ज़हर नहीं डालते, या तो खुद निकाल देते हैं या मुर्गियों को छोड़ देते हैं चरने।

    और जो भी खाद या टॉनिक डालते हैं, वो सब घर की बनी चीज़ें होती हैं जैसे वर्मी कम्पोस्ट या पंचगव्य। महक थोड़ी झेलनी पड़ती है, पर पौधों को बड़ा मज़ा आता है।

    क्यों करें ये मेहनत? क्या फायदा है?

    ऑर्गेनिक खेती में फायदा ही फायदा है, बस थोड़ा धैर्य चाहिए। सबसे पहले तो प्रकृति को राहत मिलती है—नदी-नालों में केमिकल नहीं बहता, हवा साफ़ रहती है, और ज़मीन में जान बची रहती है। सूखे मौसम में भी पानी ज्यादा साफ और टिकाऊ रहता है।

    और खाने का स्वाद? अरे भाई, शहर में रहने वाला मेरा कजिन कहता है कि “ऑर्गेनिक टमाटर खाओ तो असली टमाटर जैसा टेस्ट आता है, वरना तो प्लास्टिक लगते हैं।”

    किसानों के लिए पैसे का भी फायदा है। हर सीजन केमिकल खरीदने की टेंशन नहीं, और ऑर्गेनिक सामान बेचो तो दाम भी अच्छा मिलता है कई बार डबल! हां, मेहनत थोड़ी ज्यादा है, पर लंबे समय में जेब भी भर सकती है।

    थोड़ी मुश्किलें भी हैं, लेकिन नामुमकिन नहीं

    सच बताएं तो ऑर्गेनिक की राह फूलों से भरी नहीं है। शुरुआत के 2-3 साल फसल कम होती है, तो डर भी लगता है। फिर बाज़ार में ऐसे खरीदार ढूंढना जो सही दाम दे, वो भी एक टेंशन। और जो ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन का चक्कर है—भाईसाहब, कागज़, फीस, नियम… छोटा किसान तो थक ही जाए।

    फिर भी कुछ लोग मिसाल बन रहे हैं

    लेकिन उम्मीद की किरणें भी हैं। जैसे सिक्किम 2016 में पूरा राज्य ऑर्गेनिक बन गया! आज सब उन्हें खेती के रॉकस्टार की तरह मानते हैं। फिर Navdanya जैसे ग्रुप्स भी हैं जो 16 राज्यों में किसानों को नेचुरल खेती सिखा रहे हैं, और पुराने देसी बीज बचा रहे हैं। मतलब अगर मन से किया जाए, तो ऑर्गेनिक खेती से कमाल हो सकता है।

    आखिर में बात सीधी है…

    ऑर्गेनिक खेती आज के ज़माने में वही पुरानी देसी समझ है, बस थोड़ी और जागरूकता के साथ। ये तरीका न सिर्फ़ हमारी ज़मीन को फिर से जिंदा कर सकता है, बल्कि आने वाले कल को भी सुरक्षित रख सकता है।

    काम थोड़ा ज्यादा है, मगर अब लोग समझ रहे हैं कि अगर आज संभलेंगे तो कल की पीढ़ियों को साफ़ हवा, पानी और खाना मिल सकता है।

    तो क्यों न एक छोटा कदम हम भी उठाएं? धीरे-धीरे ही सही, मगर अपने देसी अंदाज़ में।

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